क्रिकेट सट्टे का खेल : क्रिकेट क्लब राजनीतिकों के अखाड़े


मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (एमसीए) से जुड़े हैं कुल 350 क्लब जो महाराष्ट्र के ताकतवर  नेताओं के लिए एक तरह से अखाड़ा बन चुके हैं। कुछ क्लबों के पास सिर्फ वोट की ताकत है तो कुछ के पास अपने बड़े-बड़े मैदान भी हैं। उनके पास सैंकड़ों करोड़ की आमदनी है, जिसे देख कर लार टपकती है बड़े से बड़े नेता की, और यही कारण है कि इन क्लबों पर कब्जा करने की होड़ राजनेताओं में मची हुई है। इन क्लबों में लगभग 40 तो स्कूल कालेजों के ही हैं। इसलके अलावा कई बड़ी कंपनियों, शासकीय एवं अर्धशासकीय विभागों, बैंकों इत्यादि के क्लबों पर तो ये राजनेता भले ही कब्जा नहीं कर पाते हैं लेकिन अपनी पार्टी की यूनियनों के नेताऔओं को इन पर काबिज करके परोक्ष रूप से कब्जा कर ही लेते हैं।

बता दें कि शरद पवार के किकेट की दुनिया में प्रवेश के पहले तक क्रिकेट क्लबों की सदस्यता के भाव काफी कम होते थे, ये कभी भी 5 लाख से अधिक न थे लेकिन जैसे ही शरद पवार जैसे राजनीति के महाबली ने इस क्षेत्र में कदम रखे, क्लबों की सदस्यता के भावों ने भी उछालें मारनी शुरू कर दी थीं। उन्होंने क्लब सदस्यों से जब कहा कि वे आधुनिक सज्जा और यंत्रों-उपकरणों से युक्त कई क्लब बनाएंगे और उनकी सदस्यता भी किसी एक क्लब की सदस्यता लेने पर खुद ही मिल जाएगी, तो इन क्लबों की सदस्यता के भाव आसमान छूने लगे। आज क्लबों की सदस्यता पर 15 से 60 लाख रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं।

क्रिकेट क्लबों के सभी सदस्य जानते हैं कि शरद पवार हैं तो कोई काम असंभव नहीं रह जाता है। उनकी राजनीतिक ताकत और चाणक्य बुद्धि के सामने हर नौकरशाह औऱ नेता बौना हो जाता है और उनके सामने झुक कर काम कर देता है। यही कारण है कि मुंबई के बांद्रा इलाके में स्थित बीकेसी में एमसीए रीक्रिएशन क्लब की स्थापना करवाने में शरद पवार को कोई दिक्कत नहीं आई। इस क्लब में आज 18 लाख रुपए देकर ही सदस्यता हासिल होती है। इसके पास अपनी 13 एकड़ जमीन है, जहां रणजी मैच तक होते हैं।


क्रिकेट क्लबों का बाजार अब ऐसा विस्तार पा चुका है कि वहां सैंकड़ों करोड़ रुपयों का लेन-देन हो रहा है। यह सब तबसे शुरू हिआ है, जबसे इस देश में नूडल्स क्रिकेट की स्थापना हुई है। आईपीएल के आगमन से इस खेल में पैसों की बारिश होने लगी और इस पर न केवल महाराष्ट्र बल्कि गुजरात, बिहार, दिल्ली के भी नेताओं क गिद्ध दृष्टि जम गई। वे भी यहां बंट रही मलाई में मुंह मारने के लिए लालायित हो उठे थे।

क्रिकेट की राजनीति का एक स्याह हिस्सा आज यह भी है कि इश खेल के लिए पूरा जीवन समर्पित कर चुके पुराने वक्त के महानतम क्रिकेटरों की भी यहां एक नहीं चलती है। दिलीप वेंगसरकर जैसा महान खिलाड़ी भी शिवसेना और नारायण राणे का दामन थाम कर ही इस राजनीति में कुछ हद तक टिका रह पाया है।

आजाद मैदान में एक क्लब की छोटी सी जगह है, जिसके कारण उसे मैदान वाला क्लब कहते हैं। उस पर पिछले दिनों जब एक अन्य व्यक्ति ने कब्जा किया तो उसकी कीमत 60 लाख रुपए लगाई थी।

नेताओं का कब्जा क्रिकेट क्लबों पर
क्रिकेट की सत्ता में क्रिकेटरों की नहीं चलती है, राजनेताओं की ही तूती बोलती है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हर सदस्य यही सोचता है कि ये बूढ़े शेर उनका कोई फायदा तो नहीं करवा सकेंगे, उनके बदले अगर कोई राजनेता होगा तो उन्हें दुनिया भर के फायदे होंगे। उनका क्लब भी सदा परेशानियों से से बचा रहेगा इसलिए हर सदस्य यही चाहता है कि ताकतवर नेता ही उनके क्लब का अध्यक्ष बने।


क्रिकेट क्लबों पर कब्जा करने के लिए महाराष्ट्र के तमाम कद्दावर नेताओं की लार टपकती है क्योंकि इनकी ताकत के जरिए ही एमसीए पर वे कब्जा कर पाते हैं। शरद पवार, विलासराव देशमुख, मनोहर जोशी और नारायण राणे ऐसे ही नेता हैं, जिन्होंने किसी न किसी क्लब पर कब्जा कर रखा है। एक तरफ जहां शरद पवार ने पारसी पायोनियर क्लब को अपना बना रखा है, विलासराव देशमुख मझगांव क्रिकेट क्लब पर काबिज थे, नारायण राणे ने 11-77 क्लब पर दखल बना रखा है। फिलहाल मनोहर जोशी के क्लब की जानकारी नहीं है। विलासराव देशमुख तो अब रहे नहीं लेकिन उनके जाने पर भी क्लब की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा है।

आदित्य ठाकरे भले ही कितने भी क्लबों पर कब्जा क्यों न कर लें, उनको अय क्लबों के वोटर मिल कर इसलिए हरा देंगे क्योंकि वे सत्ता में नहीं हैं।

बता दें कि विलासराव देशमुख भी तभी क्रिकेट राजनीति में उतरे थे, जब वे खुद केंद्रीय मंत्री थे। उनके पहले मनोहर जोशी को भी वोटरों ने तभी स्वीकारा था, जब वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। शऱद पवार के रुतबे औऱ रुआब से सभी वाकिफ हैं, इसके कारण वे तो क्लबों के वोटरों को सबसे पसंदीदा व्यक्ति हैं। नारायण राणे का भी क्रिकेट की राजनीति में सक्रियता शिवसेना की महाराष्ट्र में सत्ता के दौरान ही हुई थी।

विलासराव देशमुख पहले शरद पवार के कारण ही एमसीए का चुनाव नहीं लड़ते थे। उनका शरद पवार से एक तरह का समझौता था। शरद पवार को एमसीए चुनावों के दौरान भी इस नाम पर फिर अध्यक्ष चुना गया क्योंकि क्रिकेट वर्ल्ड कप भारत में करवाना था। तब तो विलासराव चुप्पी साध गए थे लेकिन पिछले चुनावों में वे अड़ गए। उन्हें सोनिया का ही सहारा मिल गया था कि वे अब शरद पवार के खिलाफ चुनाव लड़ सकते थे। पहले कांग्रेस को यह डर रहता था कि अगर शरद पवार का क्रिकेट की राजनीति में दखल कम किया तो वे केंद्र सरहकार को डांवाडोल करने के लिए कुछ न कुछ खेल जरूर रचेंगे। इस डर से बाहर निकल कर जब विलासराव देशमुख को केंद्र से हरी झंडी मिली तो वे भी अड़ गए कि इस बार एमसीए का चुनाव वे ही लड़ेंगे और मजबूरन शरद पवार को पीछे हटना पड़ा। अब विलासराव देशमुख एमसीए के अध्यक्ष पद की शोभा बढ़ाने लगे थे।  वे आठ सालों तक इ पद पर बने रहते क्योंकि एमसीए का विधान कहता है कि कोई भी व्यक्ति इस पद पर लगातार या टुकडों में आठ साल तक बने रह सकता है। हर दो साल में भले ही चुनाव होते हैं, कब्जा उसी का रहता है, जिसका कब्जा केंद्र या राज्य की सत्ता पर होता है। पर ऐसा न हो सका क्योंकि उनकी असामयिक मृत्यु हो गई।


कैसे होता है क्लब पर कब्जा
किसी भी क्लब का सचिव ही उसका संचालनकर्ता या सूत्रधार होता है। इस पुराने सचिव को पद से हटा कर राजनेता अपना सचिव स्थापित करके इन क्लबों पर कब्जा करते हैं। इतना होने भर से ही इन क्लबों की मिल्कियत भी बदल जाती है। भले ही इन क्लबों का स्वरूप ट्रस्ट जैसा होता है लेकिन बरसों बरस तक एक ही सचिव उस पर राज करता है। यही कारण है कि इन क्लबों की कीमत 60 से 75 लाख रुपए तक कुछ भी हो सकती है। पुराने सचिव को यह कीमत देकर कोई भी क्लब खरीदा जा सकता है।

क्लबों की कमाई
क्लबों की कमाई का तो कोई हिसाब किताब ही नहीं है। इन क्लबों को अपने-अपने स्तर पर जो कमाई होती है, वह करोड़ों में है। ये क्लब वर्तमान के साहूकार हैं, जिनकी तिजोरी में एक बार माल चला गया तो उस पर पूरा हक तत्कालीन प्रबंधन याने कि मालिकान का ही हो जाता है। क्लबों की ये कमाई ही तो है कि तमाम राजनेता और उद्योगपतियों-कारोबारियों और सत्ता के दलालों का खेल शुरू हो जाता है। वे इन पर कब्जा करने के लिए हर हथकंडा और दांव-पेंच आजमाते हैं।
विवेक अग्रवाल
24.05.2013

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