प्रदीप जैन हत्याकांड में सजा हुई तो फायदे में रहेगा अबू सालेम

विवेक अग्रवाल,
मुंबई, 20.02.2015
अंधेरी के बिल्डर प्रदीप जैन हत्याकांड में गिरोह सरगना अबू सालेम को अदालत ने भले ही दोषी पाया हो, कानून के जानकारों के मुताबिक यदि टाडा और आपीसी की कुछ धाराओं के तहत उसे सजा सुनाई जाती है तो अबू सालेम को खासा फायदा होगा।

बता दें कि प्रदीप जैन हत्याकांड में मुंबई की टाडा अदालत ने अबू सालेम को दोषी पाया है और फैसला सुरक्षित रखा है।

अबू सालेम आर्थर रोड जेल में बंद है। प्रदीप जैन की 1995 में हत्या के वक्त अबू सालेम भारत में नहीं था। बिल्डर प्रदीप जैन की हत्या के समय अबू सालेम डी-कंपनी के लिए काम करता था। अबू पर आरोप है कि उसने प्रदीप से हुई कहा-सुनी के कारण गोली मारने के आदेश जारी कर दिए थे। उसके कुछ शूटरों ने दिनदहाड़ो प्रदीप के दफ्तर में घुस कर गोलियां मार दी थीं।

पुलिस के आरोप पत्र के मुताबिक अंधेरी की एक संपत्ति को लेकर प्रदीप जैन और अबू सालेम में विवाद हुआ था। प्रदीप जैन ने गुस्से में अबू को कुछ बातें सुना दी थीं। अबू ने नाराज होकर प्रदीप जैन की हत्या करवाई थी। इस मामले में पहले ही दो लोगों को सजा हो चुकि है। दो आरोपी हो गए थे दोषमुक्त।

मुंबई हाईकोर्ट के वकील राजा ठाकुर के मुताबिक अबू चूंकी पुर्तगाल से प्रत्यर्पित हुआ था इसलिए भारत सरकार ने यह लिखित आश्वासन दिया था कि उसे फांसी की सजा नहीं दी जाएगी। यही नहीं, उसे आजीवन कारावास भी दिया जाता है तो महज 25 साल के लिए ही दिया जाएगा। वे आगे बताते हैं कि तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने एक पत्र पुर्तगाल सरकार को सौंपा था, जिसमें ये बातें साफ तौर पर लिखी हुई थीं।

श्री ठाकुर आगे बताते हें कि अबू सालेम के खिलाफ आपीसी की धारा 120-बी के तहत देश की किसी अदालत में मामला इसी कारण से नहीं चलाया जा सकता है क्योकि जिन धाराओं के तहत चल रहे जिन मामलों में उसका प्रत्यर्पण हुआ है, उसमें इस धारा का उल्लेख ही नहीं है। उनके मुताबिक मुंबई पुलिस ने इसी कारण से फिल्म अदाकारा मनीषा कोईराला के सचिव अजीत देवानी की हत्या के मामले से अबू सालेम का नाम वापस ले लिया था।

वे कहते हैं कि उसके खिलाफ इन्हीं कारणों से टाडा के तहत मामला भी नहीं चलाया जा सकता है। टाडा के तहत अबू के खिलाफ अगर सजा सुना दी जाती है तो युरोपीय संघ के साथ हुई प्रत्यर्पण संधी का घोर उल्लंघन होगा।

श्री ठाकुर ने यह भी बताया कि अबू सालेम पर धारा 302 और 307 के तहत भी मामला नहीं चलाया जा सकता है क्योंकि उस समय वह देश में था ही नहीं।

वे बताते हैं कि सन 2011 में ही पुतगार्ल सरकार ने अबू का भारत को हुआ प्रत्यर्पण रद्द करार दिया है। इस हिसाब से तो अबू का अब देश में रहना युरोपीय संघ से हुई प्रत्यर्पण संधि का उल्लंधन ही मान जाएगा।

इस बारे में एक राजयनयिक और कूटनीतिक मामलों के जानकार से बात की तो उन्होंने पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि अबू सालेम के खिलाफ प्रत्यर्पण संधि के उल्लंधन के बावजूद उसे वापस इसलिए पुर्तगाल नहीं भेजा जा रहा है क्योंकि ऐसा संभवतः वह देश ही नहीं चाहता है। उनका मानना है कि यदि एक आरोपी को वापस भेज दिया तो फिर युरोपीय संघ के तमाम देश भारतीय आतंकवादियों और अपराधियों – गिरोह सरगनाओं की सबसे सुरक्षित पनाहगाह बन जाएगा।

वे साथ ही यह भी चेतावनी देते हैं कि यदि भारत सरकार और अदालतें लगातार इस तरह से संधि का उल्लंघन करती रहीं, तो आगामी प्रत्यर्पण के मामलों में युरोपीय संघ भारत को इंकार करने की स्थिति में होगा। इसका फायदा अपराधी और आतंकवादी उठा सकते हैं। वे अबू सालेम के अधिकारों के हनन संबंधी सरकारी और न्यायिक दस्तावेज युरोपीय देशों की अदालतों में पेश करके खुद के प्रत्यर्पण पर रोक हासिल करने में कामयाब हो सकते हैं।

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