सेवा का मेवा – भाग 2 - ई-पंजीकरण क्यों नहीं करवाते दलाल

मुंबई में संपत्ति खरीदारों और घर किराए पर लेने वालों की दुर्गति का सिलसिला कब खत्म होगा, यह कोई नहीं कह सकता। यह जरूर है कि उनकी यातना की जानकारी जब तक नीति नियंताओं और अधिकारी वर्ग को नहीं होगी, तब तक तो उसमें सुधार की कोई गुंजाईश नहीं होगी। कुछ सुधार हुए तो तो हैं लेकिन वे ऊंट के मुंह में जीरा सरीखे ही हैं। इस खास लेखमाला में मुंबई मित्र समूह के वरिष्ठ खोजी पत्रकार विवेक अग्रवाल कर रहे हैं इस मामले में कुछ और सवाल सरकार से।

सरकार कहती है कि उसे जनता की बहुत फिक्र है। सच तो यह है कि ऐसा होता तो आजादी के बाद दिख नहीं रहा है। यदि ऐसा होता तो आज तक इतने बड़ेस्तर के घोटाले नहीं हुए होते। न ही देश की एसी दुर्गत होती। सच तो यह है कि गोरे अंग्रेज गए, उनके बदले में देसी साहबों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। गांव – देहात की जनता को जस का तस गंवार बनआ रखा, शहरी पढ़ी-लिखी आबादी को छोटी-छोटी जरूरतों और सुविधाओं का मोहताज बनाए रखा, देश की जनता को धर्म, जाति, क्षेत्र के खांचों में बांटे रखा।

इन छोटी-छोटी जरूरतों में किसी भी किस्म के दस्तावेजों के लिए स्टांप शुल्क लगाना अनिवार्य कर दिया और पंजीकरण भी जरूरी बना दिया। ऐसे में समस्या यह हो गई है कि लोगों को लंबी-लंबी लाईनों में लगना पड़ता है। अपना कामकाज छोड़ कर घंटों धूप, ठंड और बारिश में परेशान होना पड़ता है। दलाल और सरकारी बाबू इनकी इस तकलीफ में भी सुख का अनुभव महसूस करते हैं। वे अपने वातानुकूलित दफ्तरों में बैठ कर आम जनता के कष्ट की अनदेखी करते हैं।

सन 2013 में महाराष्ट्र सरकार ने इन सबका ध्यान रखते हुए और सरकारी तिजोरी में धन की आमद और बढाने के इरादे से लीव ऐंड लाइसेंस समझौतों का ई-रजिस्ट्रेशन करवाने की व्यवस्था शुरू की। तब सरकार ने बड़े गाल बजाए कि अब आपको अपने किराया संबंधी दस्तावेज और करारनामे का अपने घर पर ही पंजीकरण कराने की सुविधा मिल गई है। सरकारी अमले ने खूब ढोल पीटे कि इन करारनामों या समझौतों का ई-रजिस्ट्रेशन करने के लिए अब आपको उप-पंजीयक कार्यालय (एसआरओ) नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन क्या यह सत्य है? बिल्कुल नहीं। आज भी इन दफ्तरों के बाहर लंबी लाईनें लग रही हैं।

महाराष्ट्र में लीव-लाइसेंस एग्रीमेंट अनिवार्य है, इसकी अवधि 11 महीने से 5 साल या इससे भी अधिक हो सकती है। बता दें कि मुंबई, पुणे और राज्य के तमाम शहरों में घरों या फ्लैट की खरीददारी के बदले में किराए पर लेने संबंधी करार की बढ़ती संख्या देखते हुए स्टांप एवं पंजीयक विभाग ने फैसला किया था कि अपने दफ्तरों से यह बोझ कम किया जाए और साथ ही लोगों को भी इस परेशानी से मुक्ति दिलवाई जाए। आंकड़ों के मुताबिक 2011-12 में मुंबई में 1 लाख से अधिक आवासीय किराया करारनामे पंजीकृत हुए थे जबकि 2010-11 में यह संख्या 97,600 थी।

इस पर राज्य के तत्कालीन राजस्व मंत्री बालासाहब थोरात ने बताया था कि सरकार के इस कदम से कामकाज में पादर्शिता आएगी, राजस्व में भी बढ़ोत्तरी होगा। एनआईसी के साथ पंजीयन और स्टांप विभाग ने नया आवदेन ई-रजिस्ट्रेशन तैयार किया है जो खासा सुविधाजनक होगा। पहले पंजीयन के लिए एसआरओ जाना होता था लेकिन ई-रजिस्ट्रेशन से लोग बिना एसआरओ गए ऑनलाइन पंजीकरण पाएंगे। स्टांप एवं पंजीयन विभाग ने भी कहा था कि किसी नागरिक को कागजात ई-रजिस्ट्रेशन या ई-फाइलिंग के लिए एजंट की मदद नहीं लेनी होगी। नागरिक सीधे एसआरओ जाकर वकीलों की मदद से यह काम कर सकेंगे।

दोनों ही स्थितियों में कहा जा सकता है कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि इसके लिए सरकार ने उचित व्यवस्था ही नहीं की है। न तो लोगों के बीच इसे लोकप्रिय बनाने के लिए इश्तहार दिए। न तो इसकी जानकारी के लिए इस विभाग के बाहर सूचना पट लगाए। न तो इसके लिए केंद्र बनाए। न ही इसके लिए बैंकों या निजी संस्थानों से कोई समझौते किए। यदि बैंकों के साथ इस संदर्भ में समझौते हो जाएं और उन्हें एक या दो फीसदी की दर से हर करारनामे के पंजीकरण के लिए सेवाशुल्क मिल जाता है तो देश का कोई भी बैंक यह सेवा देने के लिए खुशी - खुशी राजी हो जाएगा।

कहा गया था कि ई-रजिस्ट्रेशन आवेदन इंटरनेट से कभी और कहीं भी प्राप्त होगा। लोग घरों या किसी जगह से ई-रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। यह बताया गया कि मकान मालिक और किराएदार को ऑनलाइन तमाम जानकारी वेबसाईट पर भर कर वहीं से रकम भी जमा करनी होगी। इस काम के लिए लगने वाला शुल्क इस तरह होता है। किराए और अग्रिम जमा राशी को जोड़ कर उसके 0.25 प्रतिशत स्टांप ड्यूटी लगती है। इसके अलावा 1000 रुपए पंजीकरण शुल्क है। संबंधित दस्तावैज भी स्कैन करके डालने होंगे। इसके बाद ई सब रजिस्ट्रार तमाम जानकारियां देख और समझ कर उन्हें स्वीकार कर लेगा और कुछ समय में इन्हें पंजीकृत करके फिर से वेबसाईट पर अपलोड कर देगा। इन्हें आप डाऊनलोड करके या तो डिजीटल स्वरूप में रख सकते हैं या फिर उनके प्रिंट लेकर भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

इसके बाद नागरिक के घर पर ई-रजिस्ट्रेशन सेवा मुहैया होगी। महाराष्ट्र सोसाइटीज वेलफेयर ऐसोसिएशन के अध्यक्ष रमेश प्रभु ने कहा था कि सरकार की इस पहल से लालफीताशाही कम होगी और सरकार के राजस्व में भी इजाफा होगा। तो यह सब हो गया? आम जनता तो ऐसा नहीं मानती है। आज भी आलम यह है कि किसी भी दलाल के पास किराए का घर लने के लिए जाएं तो पहले वह अपनी दलाली की बात करेगा, दूसरी बात वह पंजीकरण के लिए लगने वाली दलाली की रकम के बारे में बताएगा। यह पंजीकरण की दलाली भी वह मकान मालिक और किराएदार, दोनों से ही आधी-आधी वसूलता है। यदि वह 5 हजार रुपए दलाली बताता है तो उसका आधा हिस्सा याने कि ढाई हजार रुपए वह अलग-अलग दोनों से वसूलता है। यदि बतौर स्टांप शुल्क 1500 रुपए लग रहे हैं तो इसका भी आधा हिस्सा वह किराएदार से लेगा, आधा मकानमालिक से। लेकिन जब बात आती है पंजीकरण करवाने की तो सबको लेकर वह पंजीकार के दफ्तर जा पहूंचता है। यहां पर होने वाली परेशानी झेल कर दस्तावेज पंजीयन के लिए पहुंचे लोगों को लगता है कि वाकई वे बतौर दलाली जो रकम दे रहे हैं, वह उचित है। एक तरह से देखा जाए तो जो सेवा दलाल उपलब्ध करवा रहा है, उसके सामने रकम कम ही है।

सवाल यह है कि आखिर दलाल यह काम सरकारी वेबसाईट पर जाने से क्यों कतराते हैं? एक दलाल से इस बारे में बात की तो उसने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ई-पंजीकरण की व्यवस्था काफी दुविधा भरी है। इतनी सारी जानकारियां मांगी जाती हैं, उन्हें भरने में परेशानी हो जाती है। यह समझ नहीं आता है कि किस तरह से यह व्यवस्था काम करेगी। उस पर तुर्रा यह कि अपने दफ्तर में एक कंप्यूटर के साथ इमेज स्कैनर और फिंगरप्रिंट स्कैनर के अलावा फोटो खींचने के लिए कैमरा भी लगाना होता है। उसमें मकानमालिक, किराएदार, दो गवाहों की तमाम जानकारियां भरनी होती हैं। उनके फिंगरप्रिंट व दस्तावेज स्कैन करके फोटो के साथ सब कुछ अपलोड करना होता है। यह सब करने में हालत खस्ता हो जाती है। हम एक दिन में चार दस्तावेज का पंजीकरण भी खुद नहीं कर सकते हैं। इसका एक बड़ा कारण इस वेबसाईट का काफी धीमा होना भी है।

क्या यह माना जाए कि यह दलाल सच बोल रहा था? एक हद तक - हां। जिस दलाल से बात हुई है, वह असल में काफी समझदार है और ईमानदारी से कारोबार करने वालों में से एक है। वह खुद सीधे पंजीकार कार्यालय में ही दस्तावेजों का पंजीकरण करवाते हैं। इसके लिए वे कोई घुमावदार बात नहीं करते हैं। वे कहते हैं कि सरकार इस व्यवस्था को सरल और तेज गति का बनाए तो इसका फायदा सभी उठाना चाहेंगे। जब तक सरकारी वेबसाईट पर काम तेज गति से और समझ में आने वाली भाषा में नहीं होगा, तब तक इसका इस्तेमाल आम जनता नहीं कर सकेगी। क्या सरकारी बाबू और नीति नियंता इस बारे में विचार करेंगे?
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